वो लकड़ी के बल्ले से लोहा मनवा गया : Farewell to Sachin Tendulkar

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एक टेलीविज़न चैनल को सचिन तेंदुलकर के सम्मान में कुछ यह पंक्तियाँ कहते हुए सुना :
करोड़ो के लिए उम्मीद, मगर मैदान में 11 लोगों के लिए सरदर्द… इनके बल्ले से निकली गेंद कभी रुकी नहीं… रुके तो बस स्कूल – कॉलेज – सरकारें… ऊपर वाले को किसने देखा है, मगर यह भी कोई आम इंसान नहीं…

सबसे पहले तो मैं हमारी पीढ़ी की तरफ से सचिन तेंदुलकर को तहेदिल से शुक्रिया कहना चाहता हूँ कि हम उनके खेल और खेल के प्रति भावना को अपने जमाने में देख पाए और महसूस कर पाए। जब भी याद करता हूँ तो याद आता है कि उन्हें हमारी पीढ़ी के लोग स्कूल के जमाने से जानते है। तब स्मार्ट फ़ोन हुआ नहीं करते थे जिस से उनका स्कोर जाना जा सके। अलबत्ता इनका स्कोर जानने के लिए स्कूल बैग में छुपा के रेडियो लाया करते थे या अहम् मैच में स्कूल से भाग जाया करते थे। आप पूरे भारत में किसी भी परिवार में जा के पूछेंगे कि, “क्या ऐसा आपको लगता है कि तेंदुलकर धीरे धीरे, वर्ष-दर-वर्ष आपकी आँखों के सामने बड़े हुए है, तो यह अहसास हमेशा दिल में रहता है कि वो घर के एक आभासी सदस्य है?” तो इस पर जवाब बड़ी सरलता से आएगा कि “हाँ… बिल्कुल!”

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पता ही नहीं लगा कि कब बूस्ट के विज्ञापन में कपिल के साथ दिखने वाला यह किशोर इतना उम्र-दराज हो गया कि रिटायरमेंट की दहलीज पर उसका करियर आ गया… मन मानने को तैयार नहीं कि ऐसा हो गया है। ऐसा एहसास तो माता-पिता के समान है जिनकी आँखों के सामने उनका बेटा या बेटी दुनिया की नज़र में कितने ही बड़े क्यों नहीं हो जाए किन्तु माता पिता की नज़र में छोटे ही होते है। वैसे तो इन दिनों, कई बातें की जा रही है सचिन तेंदुलकर पर किन्तु, कुछ अनकहे पहलुओं या कम सुने पहलुओं का जिक्र मैं करने जा रहा हूँ, यह जानते हुए कि उनके बारे में जितना कहा जाए, कम है।

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खेल की दुनिया में सचिन के दौर से पहले या दौरान कई महान खिलाड़ी आये जैसे माइक टायसन, डिआगो मेराडोना, टाइगर वुड्स, माइकल शुमाकर, पीट सेमप्रास, वसीम अकरम इत्यादि, इन सब महान खिलाड़ियो की शुरुआत सचिन की खेल की शुरुआत से ज्यादा सफल रूप से हुई किन्तु इन सभी खिलाड़ियो के करियर का अंत या तो किसी न किसी विवाद के दायरे में रहते हुआ या खेल के गिरती फॉर्म की वजह से। सचिन इन सब से परे है, जिनका रिटायर होना उतना ही शानदार था जितना शानदार पर्दापण। अपने खेल की बारीकियों पर इस कदर ध्यान देना की हर मैच से पहले नींद उड़ जाए और बतौर बल्लेबाज़, ब्रह्मांड के सबसे बड़े ऊर्जा स्त्रोत की तरफ देखते हुए मन में यह प्रण करते हुए मैदान में प्रवेश करना कि हर शॉट में देश से जुड़ाव और खेल भावना समाहित दिखे। कई प्रशंसक और आलोचक 24 साल के दौरान आये किन्तु वह कभी नहीं बोले, बस बोला तो उनका बल्ला और भाषा थी – रनों की। अपने शांत स्वभाव की वजह से विरोधी खेमे में भी इज्जत इसलिए रखते थे और है क्योंकि वो जेंटलमेन गेम कहे जाने वाले खेल को एक सच्ची खेल भावना से खेलते थे।

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बहुत बार हमने देखा भी है कि अम्पायर के आउट करार देने से पहले वो पवेलियन की तरफ चलना शुरू कर देते थे जब उन्हें यह पता होता था कि वो शत-प्रतिशत आउट है। भारतीय टीम के हर नए मेहमान से स्वयं जा के मिलना और उसे रिलैक्स करते हुए हौसला देना उनकी एक खूबी रही। युवराज सिंह जिन्होंने 2011 विश्वकप में यह राज़ खोला था की दरअसल वो यह विश्वकप जिस इंसान के लिए खेल रहे थे वो सचिन तेंदुलकर ही है, ने एक वाक्या बताया की जब उन्होनें सचिन तेंदुलकर से पहली बार हाथ मिलाया था तब उस हाथ की पूरी हथेली को पाउडर की तरह शरीर पर मल लिया था। सचिन ने अपने विदाई समारोह में जो भी बातें कही उसमें मुझे सबसे ख़ास यह लगी कि उन्होंने भारतीय टीम के मेडिकल स्टाफ को भी धन्यवाद दिया। यह सुनने में छोटा है किन्तु बेहद महत्वपूर्ण भी, क्योंकि एक खिलाड़ी अगर फिट है तो उसके खेलने की शैली और फॉर्म तो बाद में आते है। अंजलि तेंदुलकर ने सही कहा कि विवाह से पूर्व और पश्चात् यह मानती थी कि सचिन पहले क्रिकेट के हैं, बाद में परिवार के।

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अक्सर विजय हजारे, विश्वनाथ, मोहिंदर अमरनाथ, सुनील गावस्कर, कपिल देव, श्रीकांत जैसे खिलाड़ियो का जिक्र अपने पापा से सुनने को मिल जाता है। जब कपिल रिटायर हुए तो पापा ने कहा कि अब क्या क्रिकेट देखें कपिल के बाद!!! मुझे यह सुन के अटपटा लगता था लेकिन आज जब सचिन रिटायर हुए तो लगा कि अब सचिन के बिना हम क्रिकेट क्या देखें!!! शायद पापा को अपने दौर के कपिल पसंद थे और हमें सचिन। चलिए, यह भी खूब है की अगली पीढ़ी को हम सचिन का ज़िक्र कर पायेंगे इन पंक्तियों के द्वारा :

क्रिकेट का एक युग ऐसा भी था जब महान तेंदुलकर का दौर था. तिरंगा लहराते सुधीर का शंखनाद घनघोर था, दर्शकदीर्घा से तालियों के साथ मधुर “सचिन…सचिन” का शोर था… 5 फिट और 6 इंच की शख्शियत पर बाउंसर्स डालते गेंदबाजों का चलता न जोर था… अविस्मर्णीय शैली से जब छूता उनका बल्ला गेंद को तो बस सिक्स या फोर था.”

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अब शायद हम 24 साल से एक-दूसरे से वही पुराना पूछे जाने वाला सवाल कभी नहीं जुबान पर ला पायेंगे : “सचिन ने कितने बनाए…!!!”
आइयेगा कभी, सचिन के रिटायरमेंट के प्रति मन में उठी सैकड़ो अभिव्यक्तियों को मेरे चेहरे पर पढने…!
फिलहाल भीगे लफ्जों को विदा करता हूँ आपकी आँखों तक के सफ़र के लिए…

आपका :
संदीप उपाध्याय ‘अभिव्यक्ति’

Also see : Farewell to the God of Cricket

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