क्या वाकई आज़ाद हैं हम…!!!

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आज पूरा देश आज़ादी की 65वी जयंती मना रहा है। हर तरफ जश्न का माहॉल, खुशी से झूमते लोग, पूरा देश जैसे मदमस्त हवा में झूम रहा है। आख़िर खुशी की बात भी तो है। आज से ठीक 65 साल पहले हमारे अनेक वीरों ने इस भारत भूमि के लिए अपने प्राणो को न्योछावर किया। आज उन्ही के बलिदान की बदौलत हम इस खुली हवा में विचरण कर रहे हैं। ज़ाहिर सी बात है जनाब, हम आज़ाद भारत देश के आज़ाद नागरिक हैं।

सन् 1857 में पहली बार आज़ादी का बिगुल बजा और मंगल पांडे, तात्या टोपे और लक्ष्मीबाई जैसे वीरों ने आज़ादी का शंखनाद किया। लेकिन वो क्रांति अंग्रेज़ों द्वारा दबा दी गयी। लेकिन अंग्रेज़ अगर कुछ नही दबा सके थे तो वो थी हमारे होसलों की उड़ान। एक बार फिर हमारे हॉंसलों को जैसे पंख लगे और वो खुले आसमान में उड़ने को आतुर होने लगे। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु उन्ही कुछ पंछीयों में से थे जो बेखौफ़ होकर उड़ान भरना चाहते थे। उन्हे न किसी का भय था न ही ख़ौफ़। वे तो बस अपनी मातृभूमि के दीवाने थे जो अपनी भारत माँ को विदेशियों के चंगुल से छुड़ाना चाहते थे। नेताजी, आज़ाद, वल्लभभाई जैसे वीरों ने भी कभी अपने प्राणों की चिंता न करते हुए बस आज़ाद भारत का ख्वाब संजोया। बापू के अथक प्रयासों के बाद हमे आज़ादी मिली और हम कहलाए आज़ाद भारत के आज़ाद नागरिक। और आज भी हम कहलाते है आज़ाद भारत के आज़ाद नागरिक। तो आख़िर हम हैं आज़ाद।

बस कुछ मुठ्ठी भर अंग्रेज़ों से पीछा छुड़ाकर अगर हम समझते हैं की हम आज़ाद हैं तो शायद ये हमारी सबसे बड़ी भूल होगी। आज का भारत, भारत नही इंडिया है। पीछे छूट गये है वो देश प्रेम के जज़्बे, वो मातृभूमि से प्यार। बस रह गया है तो नफ़रत और अपनो से ही तिरस्कार। आज हमारे देश ने काफ़ी प्रगति करी, आसमान की उँचाइयों को छुआ, देश-विदेश मे नाम कमाया पर आज के इंडिया और भारत के बीच में एक दीवार खड़ी हो गयी है।

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आज देश के युवा जो की इस देश की सबसे बड़ी ताक़त हैं, बस बिज़ी हैं अपने करियर में, अपनी गर्लफ्रेंड में और अपनी फेसबुक की लाइफ में। उन्हे मतलब होता है बस अपनी नाइट लाइफ से, अपनी पार्टियों से और अपने स्टेटस सिंबल से। उन्हे कोई मतलब नही देश के हाल से, देशवासियों के हाल से। लेकिन फिर एक बूढ़ा व्यक्ति आया इस देश में क्रांति लाने। उसके पीछे ढाल बन कर जो खड़े थे वो थे इस देश के ही युवा। तब सारे देश को पता चला की जो सिर्फ़ फेसबुक मे रहता है वो ज़रूरत पड़ने पर अपने देश के लिए ‘अन्ना’ भी बन सकता है। आदरणीय अन्ना हज़ारे के समर्थन में रीढ़ की हड्डी थे इस देश के युवा। और इसके बाद जैसे युवाओं के लिए देश के हर व्यक्ति का नज़रिया ही बदल गया। आज का युवा जहाँ अपनी निजी ज़िंदगी के बार में सोचता हैं उतना ही विचार वो अपने देश के बारे में भी करता है।

आज का इंडिया चाहे कितना भी हाईटेक हो गया हो पर भारत आज भी जकड़ा हुआ है ग़रीबी, भ्रष्टाचारी, बेईमानी, छुआछूत, बेरोज़गारी, दहेज, जातिवाद, आरक्षण, आदि अनेक कुरीतियों में। जहाँ एक ओर भारत की ग़रीब जनता भूख प्यास से मरती हैं वहीं हमारे नेताओं और मंत्रियों को बस अपने रसूख और रुबाब का नशा है। फिर भी हम आज़ाद हैं।

जहाँ लोकपाल सरीखे बिलों को हमारे सांसद सिरे से नकार देते हैं वहीं अपने वेतन भत्ता बढ़ाने के बिल को चुपचाप पास करा देते हैं। फिर भी हम आज़ाद हैं।
जहाँ एक ओर सीमा पर सिपाही अपनी छाती पर दुश्मनो की गोली ख़ाता है और आम आदमी रोज़ एक बम ब्लास्ट में मारा जाता है, वहीं हमारे नेताओं की सुरक्षा पर पैसा पानी की तरह बहाया जाता है। फिर भी हम आज़ाद हैं।

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जहाँ एक ओर किसान अपनी हाड़तोड़ मेहनत से फसल उगाता है, वहीं उसकी फसल से निकले अनाज को बर्बाद कर दिया जाता है, पर ग़रीबों को मुफ़्त नहीं बांटा जाता है। फिर भी हम आज़ाद हैं।

जहाँ एक ओर बॉलीवुड के कलाकार के घर रोज़ क्या होता है उसमे पत्रकार को बहुत मज़ा आता है, वहीं अगर उसके सामने कोई अपने आप को आग लगा दे तो बस उसे कवरेज करने में मज़ा आता है, क्यूं नही वो उसकी आग बुझता है। फिर भी हम आज़ाद हैं।

जहाँ एक ओर ग़रीब अपने सरकारी काम निपटाने में चप्पल घिसा देता है, वहीं रसूखदारों का काम चुटकियों में निपटा दिया जाता। फिर भी हम आज़ाद हैं।

जहाँ एक ओर रोटी, कपड़ा, मकान, जल, बिजली जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं नही, वहीं दूसरी ओर सरकार ग़रीबों को मुफ़्त मोबाइल बांट कर, इस महंगाई के ज़माने में उनके ज़ख़्मों पे नमक छिड़क रही है। फिर भी हम आज़ाद हैं।

जहाँ क़ाबलियत को ना देखकर जाति के दम पर आरक्षण दे दिया जाता है, वहीं एक ग़रीब होनहार भी पिछड़ा ही रह जाता है। फिर भी हम आज़ाद हैं।

जहाँ एक ओर आम-आदमी मुफ़्त क्षिक्षा, मुफ़्त दवाइयों के सपने ही देखता रह जाता है, वहीं एक नेता देश की जनता की मेहनत की कमाई का टॅक्स निचोड़ कर मुफ़्त विदेश यात्रा कर आता है। फिर भी हम आज़ाद हैं।

जहाँ पुलिस, फायर-ब्रिगेड और एम्बुलेंस से पहले पिज़्ज़ा पहुँच जाता है, वहीं एक ग़रीब आदमी अगले दिन खाना मिलने की आस में हर रात भूखा सो जाता है। फिर भी हम आज़ाद हैं।

जहाँ सफाई करवानी हो तो सफाईकर्मी ही याद आता है पर छुआछूत के नाम पर उसे मंदिर से धक्का दे दिया जाता है। फिर भी हम आज़ाद हैं।

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जहाँ सब चाहते हैं की हमे दुनिया की सर्वश्रेष्ठ बहू मिले, वहीं घर में पैदा होते ही बेटियों को मार दिया जाता है। फिर भी हम आज़ाद हैं।

जहाँ अपनी बहू-बेटियों को कोई न छेड़े पर दूसरी लड़कियों पे फब्तियाँ कसने में मज़ा आता है। फिर भी हम आज़ाद हैं।

जहाँ बेटों पे कोई रोक-टोक नही पर विधवाओं को डायन कहा जाता है। फिर भी हम आज़ाद हैं।

जहाँ नदियों को पूजा जाता है, वहीं फ़तहसागर, पिछोला और आयड़ में हज़ारों टन कचरा बहा दिया जाता है। फिर भी हम आज़ाद हैं।

जहाँ एक ओर एक्सप्रेसवे और हाइवे का जाल बुना जाता है, वहीं दूसरी ओर गावों की ओर आज भी कच्चा रास्ता ही जाता है। फिर भी हम आज़ाद हैं।

जहाँ आम आदमी अपने टूटे-फूटे घर की मरम्मत कराए तो झीलों की परिधि के क्षेत्र में निर्माण की धज्जियाँ उड़ाने की सज़ा मिल जाती है, वहीं उस इलाक़े में बड़ी-बड़ी आलीशान होटलें बन जाती हैं। फिर भी हम आज़ाद हैं।

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अगर आपको अब भी लगता है की आप आज़ाद भारत के आज़ाद नागरिक हैं, तो ज़रा एकबार फिर से विचार कीजिए।

सच तो ये है की हम आज भी अपनी रूढ़ीवादी विचारधारा और परंपराओं के गुलाम हैं। और फिर भी अगर कुछ बच जाता है तो हमारे ऊपर राज़ करने वाले हमारे भ्रष्ट्रतंत्र के सम्माननीय नेतागण और उन्ही के पदचिन्हों पर चलने वाले सरकारी बाबुओं के हम गुलाम बने जकड़े हुए हैं। आज फिर से ज़रूरत है एक क्रांति की जो इस देश में फैली अराजगता को मिटा सके और हमे सही मायनों मे आज़ादी का अर्थ समझा सके।

अन्यथा एक महान व्यक्ति की चंद पंक्तियां सार्थक होती नज़र आती है कि “आज देश तो आज़ाद हो गया पर देशवासी आज़ाद ना हो सके”

आशा है की आपने इस लेख में छिपी सच्चाई को महसूस किया होगा और आपके हृदय ने आपको इसपर मंथन करने को मजबूर किया होगा।

जय हिंद, जय भारत।

Article by : Paridhi Kothari

I will be waiting for your responses. Please do write back to me at query@udaipurlakecity.com

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